आखिर ये पिरामिड क्यों बनाये गए थे, जानिए पिरामिड से जुड़ी अजूबे रहस्य,

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इस धरती पर कई अजूबे और रहस्य हैं. इनमें से ही एक है पिरामिडों का रहस्य, ये कैसे बनाए गए होंगे और इनके भीतर क्या है, इसे लेकर कई तरह की कहानियां हैं, पिरामिड एक ऐसी ढांचा है जो सटीक आकार और भव्यता का अनोखा मेल है, इसे देखने वाले लोग इसके इतिहास और इसके बनावट के कायम है और पहाड़ जैसे स्वरूप वाले इस अजूबे के साथ कम से कम अपनी एक तस्वीर जीवन के अच्छी यादों के लिए कैद कर लेते हैं, लेकिन दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जिनके लिए यह ढांचा सदियों से चुनौतीपूर्ण रहा है वे लोग जिन्होंने दुनिया को बताया कि यह अद्भुत निर्माण का रहस्य कब और किसके द्वारा कराए गए और उसके बाद इन लोगों ने अपना सारा जीवन केवल इस खोज में निकाल दिया, कि आखिर क्यों इन विशाल पिरामिड्स का जन्म हुआ।

Image: Google/Pyramid

आज हम सब इसके में हम बात करेंगे एक ऐसे ही खोज और उस खोज के महान वैज्ञानिक Dr. Volodymyr krasnoholovets जिनके शोध में पिरामिड के स्वरुप में आनेे के कारणों को नए आयाम दिए जो यह भी बताया कि यह पिरामिड केवल संस्कृति या राजा के के हित में बजाने के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि उन्होंने अपनी क्रांतिकारी खोज से यह सिद्ध कर दिया कि यह सब उनकी यह सभ्यता है, इन सभी तर्कों से कहीं ऊंची सोच रखती थी जो आज के इस आधुनिक दौर की सोच से बहुत परे है।

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डॉ वोलोदयमयर कृस्नहोलोवेट्स का खोज का सबसे बड़ा आधार बना पिरामिड का केवल मिस्र में ना होकर दुनिया के अन्य देशों में मौजूद होना जैसे मध्य अमेरिका, चाइना और सूडान जैसे देशो में इन निर्माणों का होना शोध का विषय बना क्योंकि इन देशों के जलवायु और भौगोलिक स्थिति मिस्र से बहुत अलग है इन देशों में मौजूद सैकड़ों की संख्या में इन विशालकाय ढांचों के चलते यूक्रेनी मुल्क के वैज्ञानिक डॉक्टर वोलोदयमयर कृस्नहोलोवेट्स अपनी खोज की शुरुआत इस सवाल से की थी कि आखिरकार प्राचीन सभ्यताओं द्वारा दुनियाभर में यह पिरामिड क्यों बनाए गए? वहीं उनके कई सालों के शोध में जबरदस्त सफलता से प्रभावित होकर रूसी सरकार ने उन्हें पूरी तरह से सहयोग देने का फैसला किया जिसके चलते डॉक्टर वोलोदयमयर कृस्नहोलोवेट्स ने मास्को शहर में 144 फीट ऊँचे वाले पिरामिड की एक नकल तैयार की और अपने इस खोज की सफर को अगले पड़ाव पर ले गए।

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शोध में आए परिणाम हैरान करने वाले थे और डॉक्टर वोलोदयमयर कृस्नहोलोवेट्स द्वारा की गई टिप्पणियां इस खोज में क्रांतिकारी साबित हुई, जो इसके ढांचों के भीतर और इसके आसपास के हिस्से में देखी गई, जिसमें खास इस पिरामिड के अंदर रहने वाले किसी जीव की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी ह्यूमनइन सिस्टम का एक साधारण जीव से कहीं बेहतर होना पाया गया और ऊतक का दोबारा बनने की क्रिया में भी तेजी पाई गई जो किसी अन्य जगह से काफी तेज थी इसके साथ-साथ यह पिरामिड किसानों के लिए भी फायदेमंद था क्योंकि इसमें रखी गई बीजों की उपजाऊ छमता साधारण बीजों से लगभग दुगना पाए गए और वो भी कुछ 5 से 6 दिनों के अवधी में, इसी प्रकार इस पिरामिड को पर्यावरण के नजरिए से भी देखा गया कि क्या यह ढांचा पर्यावरण को संतुलित करने में कोई योगदान देता है या नहीं और यहां भी हैरान करने वाले नतीजे सामने आए जैसे ओजोन परत में सुधार और धरती के अंदर आए भूकंप के गतिविधियों में सामान और आसपास के मौसम और रेडियो एक्टिव पदार्थों का शांत रहने जैसे कई बदलाव देखे गए वहीं इसके आसपास के क्षेत्र में मौजूद तेल के कुओं में भी इसका असर देखा गया जहां कच्चे तेल में 30% तक चिकनाई में कमी आई और एक बात हैरानी की थी जिसमें तेल उत्पादन को जबरदस्त बढ़त दिलाई और इसी प्रकार अलग-अलग आयामों में खोज करने के बाद डॉ वोलोदयमयर कृस्नहोलोवेट्स ने कुछ 5000 कैदियों को नमक और मिर्च का घोल पिलाकर उनके व्यवहार और हिंसक रुप को पिरामिड के अंदर जांचने की कोशिश की जहां किसी साधारण जगह के मुकाबले उनका व्यवहार काफी शांत पाया गया जो हैरान करने वाला था। वही डॉक्टर के सहायक भौतिक शास्त्रियों ने सेमीकंडक्टर और कार्बन पदार्थों पर अलग से शोध किए जो अन्य जगहों के मुकाबले अपने गुणों और स्थिति के आधार पर इस पिरामिड में बेहतर पाए गए और इसके अलावा हैरत अंग्रेज कर देने वाले -40 डिग्री टेंपरेचर पर पानी की तरलता का बना रहना और इसे जरा सा हिलाने पर इसका जम जाना सबको हैरानी में डाल दिया।

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पिरामिड के शोध में कई क्रांतिकारी नतीजों ने इनके निर्माण के वजह को एक नई दिशा दी है जहां से आज की यह पीढ़ी इस बात की कल्पना कर सकती है कि हमारे पूर्वजों द्वारा किए गए निर्माण कार्यों के पीछे का मकसद केवल उन ढांचे को तैयार करने नहीं होता था बल्कि वह लोग विज्ञान और प्रकृति को भलीभांति समझते थे और उसी के अनुरूप चलते थे जिनकी सोच हमारी आधुनिक युग से कहीं ज्यादा बेहतर थी और इस बात का सबूत उनके द्वारा किया गए इस अद्भुत निर्माण किए गए जो हमारे आधुनिक सभ्यताओं के लिए अब तक एक पहेली बने हुए हैं क्या हमारे पूर्वजों का निर्माण का मकसद हम पूरी तरह से समझ पाएंगे इसका इंतजार सभी को है, और साथ में वैज्ञानिकों की नजर गीजा के पिरामिड पर भी है, गौरतलब है कि ये दुनिया के सात अजुबों में शुमार है, माना जाता है कि इसका निर्माण करीब 2650 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था। और साथ में बता दे की पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है जिससे भविष्य की गणना की जा सकती है।

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